Sunday, 16 February 2020

एहसास

                   एक
मेरे लिए एक एहसास हो तुम !
                    दो
तुम पास हो या दूर हो
क्या फर्क पड़ता है इससे।
                   तीन
रिश्ते जिस्मों के ही नहीं होते
मन के भी होते है
जो साथ चलते हैं ताउम्र।
                   चार
अभी अभी
महसूस किया मैने तुम्हें
आसपास कहीं
कहाँ छिप गई अचानक ?
                   पाँच
ढूँढ लेगा मन
हमेशा की तरह तुम्हें
अपने ही भीतर
तुम्हारी महक में
या फिर अदाओं में।
                   छह
अच्छा छोड़ो
बताओ ! मैं भी बसता हूँ क्या
कहीं किसी कोने में
मन में तुम्हारे
पूछना अच्छा लगता है इसलिए
यूँ उत्तर तो मालूम ही है मुझे।
                  सात
सन्त वैलेन्टाइन को भी नमस्कार
पर मुझे तो दिखते हैं अक्सर
राधामय कृष्ण या कृष्णमयी राधा
वसन्त आते ही हवाएँ हो उठती हैं मादक
फाग घोल देता है चासनी से स्वर कानों में
और अचानक सामने आ खड़ी होती हो तुम
यहाँ दूर परदेस में भी।

    ......सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'
           14.02.2020
बैठे ठाले बस यूँ ही मगर काम का.....

आग
*****
चन्द लोग होते हैं खराब
हर धर्म में हर समाज में
बदनाम मत करो
केवल इस आधार पर
सम्पूर्ण मानवता को
कलमकारी ऐसी मत करो
कि जलती आग में
पट्रोल सी गिरे
और भड़का दे आग को
और भी ज़्यादा।

मत भूलो
पड़ोसी का घर
जलेगा अगर
आँच से बच न पाओगे
तुम भी ....
और तुम्हारा घर भ
हाँ ! कहीं .....ऐसा हुआ....
किसी ने डाल दिया थोड़ा पेट्रोल
तुम्हारे घर पर भी
धूँ धूँ कर जल उठेगा घर
तुम्हारा भी।

आग से खेलना अच्छा नहीं है
आग नहीं जानती
कोई जाति या मज़हब
कोई सच्चा झूठा तर्क
और तुम्हारी बातों का मर्म।
आग सिर्फ जानती है
अपना धर्म
और वह है जलाना
निर्भर तुम पर है
कि तुम उससे क्या जलाओ
खोखले विचार
या लोगों के घर।

और हाँ ! कलमकारों से बचो
हाँ, मुझसे भी
क्योंकि उनके पास है वह अस्त्र
कि तुम्हें पता भी न चलेगा
और तुम्हारा घर
जल रहा होगा
किसी अनजानी आग में
उनकी कलम ऊँगली उठायेंगी
हिन्दुओं पर
मुसलमानों पर
या फिर किसी भी मज़हब पर
सीधे या परोक्ष में
उनके लिये उनका लिखना
एक सुन्दर लेख है बस
या सुन्दर कविता है
जिस पर बजाते हैं लोग तालियाँ
और जब जलता है घर तुम्हारा
वे ले रहे होते चुस्कियाँ
दोस्तों के बीच
अपनी प्रशंसा की।

उन चैनलों से भी बचो
जो रोज़ कराते हैं
मुर्ग़ों की लड़ाई
अपने चैनलों पर
देखी है न कभी
मुर्गों या तीतर की लड़ाई
एंकर होते हैं वहाँ भी
जी हाँ एंकर...
जिनके मुर्ग़े होते हैं
वे ही होते हैं वहाँ के एंकर
ऐसे ही टीवी चैनल बुलाते है
टीकाधारी पंडितों को
दाढ़ी वाले मौलानाओं को
परस्पर विरोधी विचार के धर्मज्ञों को
काँव काँव करते राजनीतिक कौओं को
और फिर शुरु हो जाती है
मुर्ग़ों की लड़ाई
टीआरपी बढ़ रही है
देश गिर रहा है
उनसे क्या
बचो, इनसे भी बचो!

और बन्द कर दो तुम भी अब
सोसल मीडिया पर
आग-आग का खेल
आग किसी एक की नहीं होती
सबकी होती है
फिर भी आग आग है
आग किसी की सगी भी नहीं होती
तुम्हारी भी नहीं
कर देगी खाक किसी दिन
तुम्हें भी
हमें भी और...
सारे वतन को
बचो, बचो इस आग़ से
बचो धर्म और मज़हब के राग से।

नहीं, शायद मैं ग़लत हूँ
बचना हल नहीं है मुश्किल का
बुझाना होगा इसे
हम सबने मिलकर
मत सोचो
कि खाली हमसे क्या होगा
बस इतना सोचो
हमें करना है अपने हिस्से का
गिलहरी योगदान
यकीन जानो
बुझेगी यह आग भी एक दिन
यकीन जानो।

                 ......सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'

Saturday, 9 March 2019



आग
*****
चन्द लोग होते हैं खराब
हर धर्म में हर समाज में
बदनाम मत करो
केवल इस आधार पर
सम्पूर्ण मानवता को
कलमकारी ऐसी मत करो
कि जलती आग में
पट्रोल सी गिरे
और भड़का दे आग को
और भी ज़्यादा।

मत भूलो
पड़ोसी का घर
जलेगा अगर
आँच से बच न पाओगे
तुम भी ....
और तुम्हारा घर भी
और कहीं .....ऐसा हुआ....
किसी ने डाल दिया थोड़ा पेट्रोल
तुम्हारे घर पर भी
धूँ धूँ कर जल उठेगा घर
तुम्हारा भी।

आग से खेलना अच्छा नहीं है
आग नहीं जानती
कोई जाति या मज़हब
कोई सच्चा झूठा तर्क
और तुम्हारी बातों का मर्म।
आग सिर्फ जानती है
अपना धर्म
और वह है जलाना
निर्भर तुम पर है
कि तुम उससे क्या जलाओ
खोखले विचार
या लोगों के घर।

और हाँ ! कलमकारों से बचो
हाँ, मुझसे भी
क्योंकि उनके पास है वह अस्त्र
कि तुम्हें पता भी न चलेगा
और तुम्हारा घर
जल रहा होगा
किसी अनजानी आग में
उनकी कलम ऊँगली उठायेंगी
हिन्दुओं पर
मुसलमानों पर
या फिर किसी भी मज़हब पर
सीधे या परोक्ष में
उनके लिये उनका लिखना
एक सुन्दर लेख है बस
या सुन्दर कविता है
जिस पर बजाते हैं लोग तालियाँ
और जब जलता है घर तुम्हारा
वे ले रहे होते चुस्कियाँ
दोस्तों के बीच
अपनी प्रशंसा की।

उन चैनलों से भी बचो
जो रोज़ कराते हैं
मुर्ग़ों की लड़ाई
अपने चैनलों पर
देखी है न कभी
मुर्गों या तीतर की लड़ाई
एंकर होते हैं वहाँ भी
जी हाँ एंकर...
जिनके मुर्ग़े होते हैं
वे ही हैं वहाँ एंकर
ऐसे ही टीवी चैनल बुलाते है
टीकाधारी पंडितों को
दाढ़ी वाले मौलानाओं को
परस्पर विरोधी विचार के धर्मज्ञों को
काँव काँव करते राजनीतिक कौओं को
और फिर शुरु हो जाती है
मुर्ग़ों की लड़ाई
टीआरपी बढ़ रही है
देश गिर रहा है
उनसे क्या
बचो, इनसे भी बचो!

और बन्द कर दो तुम भी अब
सोसल मीडिया पर
आग-आग का खेल
आग किसी एक की नहीं होती
सबकी होती है
फिर भी आग आग है
आग किसी की सगी भी नहीं होती
तुम्हारी भी नहीं
कर देगी खाक किसी दिन
तुम्हें भी
हमें भी और...
सारे वतन को
बचो, बचो इस आग़ से
बचो धर्म और मज़हब के राग से।

नहीं, शायद मैं ग़लत हूँ
बचना हल नहीं है मुश्किल का
बुझाना होगा इसे
हम सबने मिलकर
मत सोचो
कि खाली हमसे क्या होगा
बस इतना सोचो
हमें करना है अपने हिस्से का
गिलहरी योगदान
यकीन जानो
बुझेगी यह आग भी एक दिन
यकीन जानो।


                 ......सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'

Friday, 11 May 2018

एक समर्पण सभी पिताओं को..

सब जानते हैं और सब मानते हैं कि माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता, परन्तु ऐसे में क्या हम पिता को भुला सकते हैं ! पिता का स्थान भी तो कोई नहीं ले सकता। पिता के प्यार के बारे में क्यों इतना कम लिखा गया है ,जबकि प्यारी माँ की चर्चाओं से साहित्य जगत भरा पड़ा है। यह एक कोशिश है सभी पिताओं से जुड़ने की।

मैं जब इसे लिखने लगा तो मुझे लगा कि लिखने को तो यहाँ भी अनन्त है। फेसबुक में कुछ अंश ही डाल रहा हूँ। मूल कविता फेसबुक के लिये बहुत बड़ी हो जाती।

कभी न आया मेरे जीवन में......
----------------दि. ११ मई, २०१८

रोज ईजा को याद किया
और बाबू को भुला दिया
जाने क्यों इस खयाल ने
आज मुझको रुला दिया ।

ईजा की चमक थी सूरज सी
बाबू तो दीया बन ताउम्र जले
ईजा तो कह देती थी सब कुछ
बाबू के जज़्बात मन में ही ढले ।

न मैंने जाना दर्द उनका यह
न ही इसे देख कोई पाया
रोये जाने कितने बार थे बाबू
पर चेहरा हर पल मुस्काया ।

मर्द को मज़बूत सा दिखना है
यूँ खुल कर नहीं करना है क्रन्दन
किसने बाँधा होगा पुरुषों को इसमें
रोओ छुप कर, जाने कैसा है बन्धन।

उस बेटे के मरने पर ईजा ने
जितना अपना कुछ खोया होगा
यकीं मुझे है बाबू ने भी तब
कुछ कम नहीं मन में रोया होगा ।

ईजा लिपटा लेती थी सीने से
बाबू सदा न जाने क्यों सकुचाये
मन तो उनका भी होता होगा
पर जाने क्यों वे ऐसा न कर पाये ।

गुस्से में कभी कभी जब वो
हमको हड़काया करते थे
हमको खुश करने को फिर
कुछ खाने को भी लाया करते थे ।

अस्वस्थ कभी जब में होता था
बाबू भी रातों को जागा करते थे
जब सो जाता था मैं हो क्लान्त
चुपचाप मुझी को देखा करते थे ।

स्कूल छोड़ने मुझको तो
बाबू ही आया करते थे
मुझ पर गर आफत आती तो
बाबू ही टकराया करते थे ।

लोरी नहीं सुनाते थे वो पर
बस सिर पर हाथ फेरते रहते थे
आगे बढ़ना है जीवन में और
जाने क्या क्या हमको कहते थे ।

भूल गया कब क्यों मैं यह सब
सोच रहा हूँ अब मन में
बाबू तुम जैसा भी कोई प्यारा
कभी न आया मेरे जीवन में...
कभी न आया मेरे जीवन में।।

        ........   सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'

Monday, 13 November 2017

बैठे ठाले बस यूँ ही फालतू में...
           -1-
हर शख्स को एक दीवाना नज़र आता हूँ मैं
हर लौ को बस एक परवाना नज़र आता हूँ मैं
जब पी लेता हूँ छक कर तेरी आँखों की मय
हर पीने वाले को मयख़ाना नज़र आता हूँ मैं।

             -2-

मय में आँखों से क्या मिला दिया तूने साक़ी
ये नशा है कि अब कमबख्त़ उतरता ही नही
तेरी आँखों की कसम ऐ ख़ुदा-ए-मोहब्बत
तेरे बाद कोई और नशा मुझको चढ़ता ही नही।

Tuesday, 31 October 2017

राजनीति में जानवरों का महत्व

राजनीति में जानवरों का महत्व
---------------------

जिस तरह से पशु प्रेम उमड़ा है राजनीतिज्ञों के हृदय में, उससे पशु बहुत आशान्वित हैं और उनको भी राजनीति में अपना भविष्य दिखाई पड़ने लगा है। उन्हें लगता है कि वर्तमान में जो काम उनसे लिया जा रहा है, उसकी तुलना में राजनीति बहुत आसान है।

राजनीति में एक ज़माने में दो बैलों की जोड़ी बहुत प्रसिद्ध थी। दो बैलों की यह जोड़ी मुंशी प्रेमचन्द की कहानी के दो बैलों हीरा-मोती की तरह थी। बैलों की यह जोड़ी कभी अपने मालिक झूरी से अलग नही रह पाती थी और लौट के वापिस आ जाती थी। परन्तु राजनीति के इन दो बैलों की जोड़ी को जाने किसकी नज़र लगी कि एक बार गये तो मालिक झूरी के पास फिर वे वापिस न लौटे।

निराश झूरी ने फिर पाल ली एक गैय्या और बछड़ा। गैय्या और बछड़ा अच्छे खासे चल रहे थे, लेकिन दुनिया को किसी का सुख कहाँ सुहाता है ! ज़माने ने झूरी की गाय और बछड़ा भी छीन लिया और कहा अब हाथ से ही काम चला।

इसी बीच राजनीति के गाँव में कोई बकरी लाया तो कोई घोड़ा। मछली भी आई परन्तु इनमें से कोई भी चीज़ जनता को न भाई।

एक दिन एक पड़ोसन ले आई हाथी। फिल्म "हाथी मेरा साथी" हिट हो चुकी थी, इसलिये उसी झटके में पड़ोसन का हाथी भी हिट हो गया और हिट क्या हो गया, बाक़ायदा राजनीति में फिट हो गया। खूब चिंघाड़ा वह भी। राजनीति के सारे पशु घबरा कर छिप गये। जंगल में हाथी का राज हो गया।

पर हाथी की भी एक समस्या थी कि उसे साइकिल पर बैठने का बहुत मन करता था। एक बार बैठा भी तो साइकिल का पहिया फट गया । उसके बाद तो हाथी साइकिल का जानी दुश्मन हो गया । साइकिल भी हाथी को गाहे बगाहे मुँह चिढ़ाने लगी। हाथी और साइकिल के बीच अब रेस भी होने लगी, वैसे ही जैसे भारत-पाकिस्तान के मध्य क्रिकेट मैच होता है। कभी साइकिल आगे निकल जाती तो कभी हाथी। फिर एक दिन एक कमल खिला परन्तु हाथी और साइकिल ने कुछ समय बाद उसे रौंद दिया। उधर झूरी हाथ हिलाता रहा परन्तु किसी ने उसकी तरफ नही देखा। परन्तु बाद में साइकिल ने हाथ को देखा तो उसे अपना हैंडिल सौंप दिया।

तभी अचानक राजनीति में प्रवेश कर गया गधा। हर मोड़ पर गधे की आवाज़ सुनाई देने लगी। यह चर्चा होने लगी कि गधा कहाँ  का अच्छा होता है और/या हम गधे से क्या क्या सीख सकते हैं। कई लेखक और कवि गधे के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगे कि उसने उन्हें कुछ लिखने का मौक़ा दिया ।

अब तक आ चुकी थी फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' । इसमें झप्पी का बड़ा रोल था। इसके कुछ समय बाद आई  फिल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई'। इसमें फूलों की बड़ी भूमिका थी। ये दोनो आइडियाज़ गुजरात से आये एक जादूगर ने पकड़ लिये। उसने मीठी-मीठी झप्पी देना और कमल के फूल बांटना शुरू कर दिया। फूलों से पूरी राजनीति पट गई और फूलों की भीड़ में हाथी, साइकिल और साइकिल को पकड़े हुए हाथ सब खो गये। आज भी चारों ओर कमल के फूल ही फैले हुए दिखाई पड़ते हैं, सब जानवर राजनैतिक परिदृश्य से विलोपित हो गये हैं।

अब अचानक यह खबर आई है कि एक कुत्ता भी राजनीति में प्रवेश कर गया है। देखते हैं, यह कुत्ता क्या गुल खिलाता है।

सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'
केशवनगर, लखनऊ
30.10.2017