एक समर्पण सभी पिताओं को..
सब जानते हैं और सब मानते हैं कि माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता, परन्तु ऐसे में क्या हम पिता को भुला सकते हैं ! पिता का स्थान भी तो कोई नहीं ले सकता। पिता के प्यार के बारे में क्यों इतना कम लिखा गया है ,जबकि प्यारी माँ की चर्चाओं से साहित्य जगत भरा पड़ा है। यह एक कोशिश है सभी पिताओं से जुड़ने की।
मैं जब इसे लिखने लगा तो मुझे लगा कि लिखने को तो यहाँ भी अनन्त है। फेसबुक में कुछ अंश ही डाल रहा हूँ। मूल कविता फेसबुक के लिये बहुत बड़ी हो जाती।
कभी न आया मेरे जीवन में......
----------------दि. ११ मई, २०१८
रोज ईजा को याद किया
और बाबू को भुला दिया
जाने क्यों इस खयाल ने
आज मुझको रुला दिया ।
ईजा की चमक थी सूरज सी
बाबू तो दीया बन ताउम्र जले
ईजा तो कह देती थी सब कुछ
बाबू के जज़्बात मन में ही ढले ।
न मैंने जाना दर्द उनका यह
न ही इसे देख कोई पाया
रोये जाने कितने बार थे बाबू
पर चेहरा हर पल मुस्काया ।
मर्द को मज़बूत सा दिखना है
यूँ खुल कर नहीं करना है क्रन्दन
किसने बाँधा होगा पुरुषों को इसमें
रोओ छुप कर, जाने कैसा है बन्धन।
उस बेटे के मरने पर ईजा ने
जितना अपना कुछ खोया होगा
यकीं मुझे है बाबू ने भी तब
कुछ कम नहीं मन में रोया होगा ।
ईजा लिपटा लेती थी सीने से
बाबू सदा न जाने क्यों सकुचाये
मन तो उनका भी होता होगा
पर जाने क्यों वे ऐसा न कर पाये ।
गुस्से में कभी कभी जब वो
हमको हड़काया करते थे
हमको खुश करने को फिर
कुछ खाने को भी लाया करते थे ।
अस्वस्थ कभी जब में होता था
बाबू भी रातों को जागा करते थे
जब सो जाता था मैं हो क्लान्त
चुपचाप मुझी को देखा करते थे ।
स्कूल छोड़ने मुझको तो
बाबू ही आया करते थे
मुझ पर गर आफत आती तो
बाबू ही टकराया करते थे ।
लोरी नहीं सुनाते थे वो पर
बस सिर पर हाथ फेरते रहते थे
आगे बढ़ना है जीवन में और
जाने क्या क्या हमको कहते थे ।
भूल गया कब क्यों मैं यह सब
सोच रहा हूँ अब मन में
बाबू तुम जैसा भी कोई प्यारा
कभी न आया मेरे जीवन में...
कभी न आया मेरे जीवन में।।
........ सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'
सब जानते हैं और सब मानते हैं कि माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता, परन्तु ऐसे में क्या हम पिता को भुला सकते हैं ! पिता का स्थान भी तो कोई नहीं ले सकता। पिता के प्यार के बारे में क्यों इतना कम लिखा गया है ,जबकि प्यारी माँ की चर्चाओं से साहित्य जगत भरा पड़ा है। यह एक कोशिश है सभी पिताओं से जुड़ने की।
मैं जब इसे लिखने लगा तो मुझे लगा कि लिखने को तो यहाँ भी अनन्त है। फेसबुक में कुछ अंश ही डाल रहा हूँ। मूल कविता फेसबुक के लिये बहुत बड़ी हो जाती।
कभी न आया मेरे जीवन में......
----------------दि. ११ मई, २०१८
रोज ईजा को याद किया
और बाबू को भुला दिया
जाने क्यों इस खयाल ने
आज मुझको रुला दिया ।
ईजा की चमक थी सूरज सी
बाबू तो दीया बन ताउम्र जले
ईजा तो कह देती थी सब कुछ
बाबू के जज़्बात मन में ही ढले ।
न मैंने जाना दर्द उनका यह
न ही इसे देख कोई पाया
रोये जाने कितने बार थे बाबू
पर चेहरा हर पल मुस्काया ।
मर्द को मज़बूत सा दिखना है
यूँ खुल कर नहीं करना है क्रन्दन
किसने बाँधा होगा पुरुषों को इसमें
रोओ छुप कर, जाने कैसा है बन्धन।
उस बेटे के मरने पर ईजा ने
जितना अपना कुछ खोया होगा
यकीं मुझे है बाबू ने भी तब
कुछ कम नहीं मन में रोया होगा ।
ईजा लिपटा लेती थी सीने से
बाबू सदा न जाने क्यों सकुचाये
मन तो उनका भी होता होगा
पर जाने क्यों वे ऐसा न कर पाये ।
गुस्से में कभी कभी जब वो
हमको हड़काया करते थे
हमको खुश करने को फिर
कुछ खाने को भी लाया करते थे ।
अस्वस्थ कभी जब में होता था
बाबू भी रातों को जागा करते थे
जब सो जाता था मैं हो क्लान्त
चुपचाप मुझी को देखा करते थे ।
स्कूल छोड़ने मुझको तो
बाबू ही आया करते थे
मुझ पर गर आफत आती तो
बाबू ही टकराया करते थे ।
लोरी नहीं सुनाते थे वो पर
बस सिर पर हाथ फेरते रहते थे
आगे बढ़ना है जीवन में और
जाने क्या क्या हमको कहते थे ।
भूल गया कब क्यों मैं यह सब
सोच रहा हूँ अब मन में
बाबू तुम जैसा भी कोई प्यारा
कभी न आया मेरे जीवन में...
कभी न आया मेरे जीवन में।।
........ सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'
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