Monday, 13 November 2017

बैठे ठाले बस यूँ ही फालतू में...
           -1-
हर शख्स को एक दीवाना नज़र आता हूँ मैं
हर लौ को बस एक परवाना नज़र आता हूँ मैं
जब पी लेता हूँ छक कर तेरी आँखों की मय
हर पीने वाले को मयख़ाना नज़र आता हूँ मैं।

             -2-

मय में आँखों से क्या मिला दिया तूने साक़ी
ये नशा है कि अब कमबख्त़ उतरता ही नही
तेरी आँखों की कसम ऐ ख़ुदा-ए-मोहब्बत
तेरे बाद कोई और नशा मुझको चढ़ता ही नही।

Tuesday, 31 October 2017

राजनीति में जानवरों का महत्व

राजनीति में जानवरों का महत्व
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जिस तरह से पशु प्रेम उमड़ा है राजनीतिज्ञों के हृदय में, उससे पशु बहुत आशान्वित हैं और उनको भी राजनीति में अपना भविष्य दिखाई पड़ने लगा है। उन्हें लगता है कि वर्तमान में जो काम उनसे लिया जा रहा है, उसकी तुलना में राजनीति बहुत आसान है।

राजनीति में एक ज़माने में दो बैलों की जोड़ी बहुत प्रसिद्ध थी। दो बैलों की यह जोड़ी मुंशी प्रेमचन्द की कहानी के दो बैलों हीरा-मोती की तरह थी। बैलों की यह जोड़ी कभी अपने मालिक झूरी से अलग नही रह पाती थी और लौट के वापिस आ जाती थी। परन्तु राजनीति के इन दो बैलों की जोड़ी को जाने किसकी नज़र लगी कि एक बार गये तो मालिक झूरी के पास फिर वे वापिस न लौटे।

निराश झूरी ने फिर पाल ली एक गैय्या और बछड़ा। गैय्या और बछड़ा अच्छे खासे चल रहे थे, लेकिन दुनिया को किसी का सुख कहाँ सुहाता है ! ज़माने ने झूरी की गाय और बछड़ा भी छीन लिया और कहा अब हाथ से ही काम चला।

इसी बीच राजनीति के गाँव में कोई बकरी लाया तो कोई घोड़ा। मछली भी आई परन्तु इनमें से कोई भी चीज़ जनता को न भाई।

एक दिन एक पड़ोसन ले आई हाथी। फिल्म "हाथी मेरा साथी" हिट हो चुकी थी, इसलिये उसी झटके में पड़ोसन का हाथी भी हिट हो गया और हिट क्या हो गया, बाक़ायदा राजनीति में फिट हो गया। खूब चिंघाड़ा वह भी। राजनीति के सारे पशु घबरा कर छिप गये। जंगल में हाथी का राज हो गया।

पर हाथी की भी एक समस्या थी कि उसे साइकिल पर बैठने का बहुत मन करता था। एक बार बैठा भी तो साइकिल का पहिया फट गया । उसके बाद तो हाथी साइकिल का जानी दुश्मन हो गया । साइकिल भी हाथी को गाहे बगाहे मुँह चिढ़ाने लगी। हाथी और साइकिल के बीच अब रेस भी होने लगी, वैसे ही जैसे भारत-पाकिस्तान के मध्य क्रिकेट मैच होता है। कभी साइकिल आगे निकल जाती तो कभी हाथी। फिर एक दिन एक कमल खिला परन्तु हाथी और साइकिल ने कुछ समय बाद उसे रौंद दिया। उधर झूरी हाथ हिलाता रहा परन्तु किसी ने उसकी तरफ नही देखा। परन्तु बाद में साइकिल ने हाथ को देखा तो उसे अपना हैंडिल सौंप दिया।

तभी अचानक राजनीति में प्रवेश कर गया गधा। हर मोड़ पर गधे की आवाज़ सुनाई देने लगी। यह चर्चा होने लगी कि गधा कहाँ  का अच्छा होता है और/या हम गधे से क्या क्या सीख सकते हैं। कई लेखक और कवि गधे के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगे कि उसने उन्हें कुछ लिखने का मौक़ा दिया ।

अब तक आ चुकी थी फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' । इसमें झप्पी का बड़ा रोल था। इसके कुछ समय बाद आई  फिल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई'। इसमें फूलों की बड़ी भूमिका थी। ये दोनो आइडियाज़ गुजरात से आये एक जादूगर ने पकड़ लिये। उसने मीठी-मीठी झप्पी देना और कमल के फूल बांटना शुरू कर दिया। फूलों से पूरी राजनीति पट गई और फूलों की भीड़ में हाथी, साइकिल और साइकिल को पकड़े हुए हाथ सब खो गये। आज भी चारों ओर कमल के फूल ही फैले हुए दिखाई पड़ते हैं, सब जानवर राजनैतिक परिदृश्य से विलोपित हो गये हैं।

अब अचानक यह खबर आई है कि एक कुत्ता भी राजनीति में प्रवेश कर गया है। देखते हैं, यह कुत्ता क्या गुल खिलाता है।

सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'
केशवनगर, लखनऊ
30.10.2017

Wednesday, 23 August 2017

जग बीती- तीन तलाक़
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अन्ततोगत्वा हमारी मुस्लिम माँओं, बेटियों और बहिनों को एक बार में तीन तलाक के दंश से छुटकारा मिल ही गया। अच्छी बात यह है कि कुछ राजनैतिक दल, जो पूर्व में एक साथ तीन बार तलाक बोल कर तलाक देने के समर्थक थे या कम से कम विरोधी नही थे, ने भी मा.उच्चतम न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया है। अर्थात उन्होंने अपनी मानसिकता में परिवर्तन किया है। यह अच्छा संकेत है और इससे वह कानून बनाने का रास्ता सहज होगा जिसकी कि मा. उच्चतम न्यायालय ने अपेक्षा की है।

रूढ़ियाँ अच्छी और बुरी दोनो हो सकती हैं। समय की आवश्यकता और मांग के आधार पर उनमें यदि परिवर्तन होता है, तो समाज सभ्यता की दिशा में आगे बढ़़ जाता है और इसमें टकराव की गुंजाइश कम हो जाती है। आज यह कल्पना करके भी कोई सिहर उठेगा कि अगर आज सती प्रथा जारी रहती, तो हम अपनी माँ, बहिनो और बेटियों को रोज़ खो रहे होते। सती प्रथा के विरुद्ध भी जब कानून बना, इसे हिन्दू धर्म के विरुद्ध मानने वाले कम न थे। आज कोई पंडित कानून के डर से नही, अपितु अपने विवेक के आधार पर भी सती प्रथा की वकालत नही करेगा।

कोई भी परिवर्तन समाज में आते आते ही आता है। नये नियमों, कानूनों, तकनीक आदि का सदैव विरोध हुआ है। इसलिए इस निर्णय से नाराज़ और रूढ़िवादी विचारधारा के लोग दबी छुपी जुबान में या सामने आकर भी  इसके खिलाफ बोल सकते हैं, या बनाये जाने वाले कानून का विरोध करने की सोच सकते हैं, परन्तु अन्त में वही होगा, जो कि समाज की ज़रूरत है और मा. उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा है। कट्टरवादी विचारधारा के मौलवी/धर्मगुरु भी अपनी सोच बदलेंगे, इसकी आशा की जानी चाहिये।

संसद ने भी सभी पहलुओं पर गहन विचार के उपरांत इस विषय में कठोर विधेयक लाना चाहिये, ताकि भारत की तीन तलाक जैसी कुप्रथा अतीत की बातें रह जायें। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विवाह और तलाक दोनो को समानरूप से राजकीय अभिलेखों में भी दर्ज़ किया जाय।

निश्चित रूप से यह निर्णय भारतीय महिलाओं के लिये एक नई सुबह के समान है और किसी भी कुप्रथा से लड़ने के लिये उनमें साहस और विश्वास का संचार करेगा।