जग बीती- तीन तलाक़
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अन्ततोगत्वा हमारी मुस्लिम माँओं, बेटियों और बहिनों को एक बार में तीन तलाक के दंश से छुटकारा मिल ही गया। अच्छी बात यह है कि कुछ राजनैतिक दल, जो पूर्व में एक साथ तीन बार तलाक बोल कर तलाक देने के समर्थक थे या कम से कम विरोधी नही थे, ने भी मा.उच्चतम न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया है। अर्थात उन्होंने अपनी मानसिकता में परिवर्तन किया है। यह अच्छा संकेत है और इससे वह कानून बनाने का रास्ता सहज होगा जिसकी कि मा. उच्चतम न्यायालय ने अपेक्षा की है।
रूढ़ियाँ अच्छी और बुरी दोनो हो सकती हैं। समय की आवश्यकता और मांग के आधार पर उनमें यदि परिवर्तन होता है, तो समाज सभ्यता की दिशा में आगे बढ़़ जाता है और इसमें टकराव की गुंजाइश कम हो जाती है। आज यह कल्पना करके भी कोई सिहर उठेगा कि अगर आज सती प्रथा जारी रहती, तो हम अपनी माँ, बहिनो और बेटियों को रोज़ खो रहे होते। सती प्रथा के विरुद्ध भी जब कानून बना, इसे हिन्दू धर्म के विरुद्ध मानने वाले कम न थे। आज कोई पंडित कानून के डर से नही, अपितु अपने विवेक के आधार पर भी सती प्रथा की वकालत नही करेगा।
कोई भी परिवर्तन समाज में आते आते ही आता है। नये नियमों, कानूनों, तकनीक आदि का सदैव विरोध हुआ है। इसलिए इस निर्णय से नाराज़ और रूढ़िवादी विचारधारा के लोग दबी छुपी जुबान में या सामने आकर भी इसके खिलाफ बोल सकते हैं, या बनाये जाने वाले कानून का विरोध करने की सोच सकते हैं, परन्तु अन्त में वही होगा, जो कि समाज की ज़रूरत है और मा. उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा है। कट्टरवादी विचारधारा के मौलवी/धर्मगुरु भी अपनी सोच बदलेंगे, इसकी आशा की जानी चाहिये।
संसद ने भी सभी पहलुओं पर गहन विचार के उपरांत इस विषय में कठोर विधेयक लाना चाहिये, ताकि भारत की तीन तलाक जैसी कुप्रथा अतीत की बातें रह जायें। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विवाह और तलाक दोनो को समानरूप से राजकीय अभिलेखों में भी दर्ज़ किया जाय।
निश्चित रूप से यह निर्णय भारतीय महिलाओं के लिये एक नई सुबह के समान है और किसी भी कुप्रथा से लड़ने के लिये उनमें साहस और विश्वास का संचार करेगा।