राजनीति में जानवरों का महत्व
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जिस तरह से पशु प्रेम उमड़ा है राजनीतिज्ञों के हृदय में, उससे पशु बहुत आशान्वित हैं और उनको भी राजनीति में अपना भविष्य दिखाई पड़ने लगा है। उन्हें लगता है कि वर्तमान में जो काम उनसे लिया जा रहा है, उसकी तुलना में राजनीति बहुत आसान है।
राजनीति में एक ज़माने में दो बैलों की जोड़ी बहुत प्रसिद्ध थी। दो बैलों की यह जोड़ी मुंशी प्रेमचन्द की कहानी के दो बैलों हीरा-मोती की तरह थी। बैलों की यह जोड़ी कभी अपने मालिक झूरी से अलग नही रह पाती थी और लौट के वापिस आ जाती थी। परन्तु राजनीति के इन दो बैलों की जोड़ी को जाने किसकी नज़र लगी कि एक बार गये तो मालिक झूरी के पास फिर वे वापिस न लौटे।
निराश झूरी ने फिर पाल ली एक गैय्या और बछड़ा। गैय्या और बछड़ा अच्छे खासे चल रहे थे, लेकिन दुनिया को किसी का सुख कहाँ सुहाता है ! ज़माने ने झूरी की गाय और बछड़ा भी छीन लिया और कहा अब हाथ से ही काम चला।
इसी बीच राजनीति के गाँव में कोई बकरी लाया तो कोई घोड़ा। मछली भी आई परन्तु इनमें से कोई भी चीज़ जनता को न भाई।
एक दिन एक पड़ोसन ले आई हाथी। फिल्म "हाथी मेरा साथी" हिट हो चुकी थी, इसलिये उसी झटके में पड़ोसन का हाथी भी हिट हो गया और हिट क्या हो गया, बाक़ायदा राजनीति में फिट हो गया। खूब चिंघाड़ा वह भी। राजनीति के सारे पशु घबरा कर छिप गये। जंगल में हाथी का राज हो गया।
पर हाथी की भी एक समस्या थी कि उसे साइकिल पर बैठने का बहुत मन करता था। एक बार बैठा भी तो साइकिल का पहिया फट गया । उसके बाद तो हाथी साइकिल का जानी दुश्मन हो गया । साइकिल भी हाथी को गाहे बगाहे मुँह चिढ़ाने लगी। हाथी और साइकिल के बीच अब रेस भी होने लगी, वैसे ही जैसे भारत-पाकिस्तान के मध्य क्रिकेट मैच होता है। कभी साइकिल आगे निकल जाती तो कभी हाथी। फिर एक दिन एक कमल खिला परन्तु हाथी और साइकिल ने कुछ समय बाद उसे रौंद दिया। उधर झूरी हाथ हिलाता रहा परन्तु किसी ने उसकी तरफ नही देखा। परन्तु बाद में साइकिल ने हाथ को देखा तो उसे अपना हैंडिल सौंप दिया।
तभी अचानक राजनीति में प्रवेश कर गया गधा। हर मोड़ पर गधे की आवाज़ सुनाई देने लगी। यह चर्चा होने लगी कि गधा कहाँ का अच्छा होता है और/या हम गधे से क्या क्या सीख सकते हैं। कई लेखक और कवि गधे के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगे कि उसने उन्हें कुछ लिखने का मौक़ा दिया ।
अब तक आ चुकी थी फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' । इसमें झप्पी का बड़ा रोल था। इसके कुछ समय बाद आई फिल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई'। इसमें फूलों की बड़ी भूमिका थी। ये दोनो आइडियाज़ गुजरात से आये एक जादूगर ने पकड़ लिये। उसने मीठी-मीठी झप्पी देना और कमल के फूल बांटना शुरू कर दिया। फूलों से पूरी राजनीति पट गई और फूलों की भीड़ में हाथी, साइकिल और साइकिल को पकड़े हुए हाथ सब खो गये। आज भी चारों ओर कमल के फूल ही फैले हुए दिखाई पड़ते हैं, सब जानवर राजनैतिक परिदृश्य से विलोपित हो गये हैं।
अब अचानक यह खबर आई है कि एक कुत्ता भी राजनीति में प्रवेश कर गया है। देखते हैं, यह कुत्ता क्या गुल खिलाता है।
सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'
केशवनगर, लखनऊ
30.10.2017
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जिस तरह से पशु प्रेम उमड़ा है राजनीतिज्ञों के हृदय में, उससे पशु बहुत आशान्वित हैं और उनको भी राजनीति में अपना भविष्य दिखाई पड़ने लगा है। उन्हें लगता है कि वर्तमान में जो काम उनसे लिया जा रहा है, उसकी तुलना में राजनीति बहुत आसान है।
राजनीति में एक ज़माने में दो बैलों की जोड़ी बहुत प्रसिद्ध थी। दो बैलों की यह जोड़ी मुंशी प्रेमचन्द की कहानी के दो बैलों हीरा-मोती की तरह थी। बैलों की यह जोड़ी कभी अपने मालिक झूरी से अलग नही रह पाती थी और लौट के वापिस आ जाती थी। परन्तु राजनीति के इन दो बैलों की जोड़ी को जाने किसकी नज़र लगी कि एक बार गये तो मालिक झूरी के पास फिर वे वापिस न लौटे।
निराश झूरी ने फिर पाल ली एक गैय्या और बछड़ा। गैय्या और बछड़ा अच्छे खासे चल रहे थे, लेकिन दुनिया को किसी का सुख कहाँ सुहाता है ! ज़माने ने झूरी की गाय और बछड़ा भी छीन लिया और कहा अब हाथ से ही काम चला।
इसी बीच राजनीति के गाँव में कोई बकरी लाया तो कोई घोड़ा। मछली भी आई परन्तु इनमें से कोई भी चीज़ जनता को न भाई।
एक दिन एक पड़ोसन ले आई हाथी। फिल्म "हाथी मेरा साथी" हिट हो चुकी थी, इसलिये उसी झटके में पड़ोसन का हाथी भी हिट हो गया और हिट क्या हो गया, बाक़ायदा राजनीति में फिट हो गया। खूब चिंघाड़ा वह भी। राजनीति के सारे पशु घबरा कर छिप गये। जंगल में हाथी का राज हो गया।
पर हाथी की भी एक समस्या थी कि उसे साइकिल पर बैठने का बहुत मन करता था। एक बार बैठा भी तो साइकिल का पहिया फट गया । उसके बाद तो हाथी साइकिल का जानी दुश्मन हो गया । साइकिल भी हाथी को गाहे बगाहे मुँह चिढ़ाने लगी। हाथी और साइकिल के बीच अब रेस भी होने लगी, वैसे ही जैसे भारत-पाकिस्तान के मध्य क्रिकेट मैच होता है। कभी साइकिल आगे निकल जाती तो कभी हाथी। फिर एक दिन एक कमल खिला परन्तु हाथी और साइकिल ने कुछ समय बाद उसे रौंद दिया। उधर झूरी हाथ हिलाता रहा परन्तु किसी ने उसकी तरफ नही देखा। परन्तु बाद में साइकिल ने हाथ को देखा तो उसे अपना हैंडिल सौंप दिया।
तभी अचानक राजनीति में प्रवेश कर गया गधा। हर मोड़ पर गधे की आवाज़ सुनाई देने लगी। यह चर्चा होने लगी कि गधा कहाँ का अच्छा होता है और/या हम गधे से क्या क्या सीख सकते हैं। कई लेखक और कवि गधे के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगे कि उसने उन्हें कुछ लिखने का मौक़ा दिया ।
अब तक आ चुकी थी फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' । इसमें झप्पी का बड़ा रोल था। इसके कुछ समय बाद आई फिल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई'। इसमें फूलों की बड़ी भूमिका थी। ये दोनो आइडियाज़ गुजरात से आये एक जादूगर ने पकड़ लिये। उसने मीठी-मीठी झप्पी देना और कमल के फूल बांटना शुरू कर दिया। फूलों से पूरी राजनीति पट गई और फूलों की भीड़ में हाथी, साइकिल और साइकिल को पकड़े हुए हाथ सब खो गये। आज भी चारों ओर कमल के फूल ही फैले हुए दिखाई पड़ते हैं, सब जानवर राजनैतिक परिदृश्य से विलोपित हो गये हैं।
अब अचानक यह खबर आई है कि एक कुत्ता भी राजनीति में प्रवेश कर गया है। देखते हैं, यह कुत्ता क्या गुल खिलाता है।
सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'
केशवनगर, लखनऊ
30.10.2017
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