Tuesday, 13 December 2011

तलवार खींच ली.........

सुनके मेरा नाम तुमने तलवार खींच ली
जैसे कोई हो रार, तुमने तलवार खींच ली
माना की मज़हब मेरा तुमसे जुदा है दोस्त

इसमें क्या गुनाह, तुमने तलवार खींच ली.

कल तक थे हम साथ बैठे, संग मुस्कराए थे
हमने उस बाग़ से फल, एक साथ चुराए थे
सौ बार मैं तुम्हारे, तुम मेरे घर पे आये थे
बहिनों के साथ रिश्ते, संग-संग निभाए थे.

क्यों सूझी नयी बात, तुमने तलवार खींच ली
जैसे कोई हो रार, तुमने तलवार खींच ली.

तुम्हारी माँ के बनाये परांठे, मुझे याद हैं अभी
मेरी माँ की रोटियां भी तुम्हे पुकारती हैं कभी
ईद और दीवाली भी क्यों जुदा जुदा से हो गए
याद होगा तुमको त्यौहार मनाते थे संग सभी

और अब ये हालात, तुमने तलवार खींच ली
जैसे हो कोई रार, तुमने तलवार खींच ली.

आओ, तोड़ दें अब, इस मज़हब की दीवार को
जो कराती है दूर एक यार से उसके ही यार को
फ़िरकापरस्त वे लोग तो चालें चलते ही रहेंगे
बच के रहना उनसे वे तो निकले हैं शिकार को

करते वे खुराफात, तुमने तलवार खींच ली.
जैसे हो कोई रार, तुमने तलवार खींच ली.

सुनके मेरा नाम तुमने तलवार खींच ली
जैसे कोई हो रार, तुमने तलवार खींच ली
माना की मज़हब मेरा तुमसे जुदा है दोस्त
इसमें क्या गुनाह, तुमने तलवार खींच ली.


- सुधीर चन्द्र जोशी