Sunday, 16 February 2020

बैठे ठाले बस यूँ ही मगर काम का.....

आग
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चन्द लोग होते हैं खराब
हर धर्म में हर समाज में
बदनाम मत करो
केवल इस आधार पर
सम्पूर्ण मानवता को
कलमकारी ऐसी मत करो
कि जलती आग में
पट्रोल सी गिरे
और भड़का दे आग को
और भी ज़्यादा।

मत भूलो
पड़ोसी का घर
जलेगा अगर
आँच से बच न पाओगे
तुम भी ....
और तुम्हारा घर भ
हाँ ! कहीं .....ऐसा हुआ....
किसी ने डाल दिया थोड़ा पेट्रोल
तुम्हारे घर पर भी
धूँ धूँ कर जल उठेगा घर
तुम्हारा भी।

आग से खेलना अच्छा नहीं है
आग नहीं जानती
कोई जाति या मज़हब
कोई सच्चा झूठा तर्क
और तुम्हारी बातों का मर्म।
आग सिर्फ जानती है
अपना धर्म
और वह है जलाना
निर्भर तुम पर है
कि तुम उससे क्या जलाओ
खोखले विचार
या लोगों के घर।

और हाँ ! कलमकारों से बचो
हाँ, मुझसे भी
क्योंकि उनके पास है वह अस्त्र
कि तुम्हें पता भी न चलेगा
और तुम्हारा घर
जल रहा होगा
किसी अनजानी आग में
उनकी कलम ऊँगली उठायेंगी
हिन्दुओं पर
मुसलमानों पर
या फिर किसी भी मज़हब पर
सीधे या परोक्ष में
उनके लिये उनका लिखना
एक सुन्दर लेख है बस
या सुन्दर कविता है
जिस पर बजाते हैं लोग तालियाँ
और जब जलता है घर तुम्हारा
वे ले रहे होते चुस्कियाँ
दोस्तों के बीच
अपनी प्रशंसा की।

उन चैनलों से भी बचो
जो रोज़ कराते हैं
मुर्ग़ों की लड़ाई
अपने चैनलों पर
देखी है न कभी
मुर्गों या तीतर की लड़ाई
एंकर होते हैं वहाँ भी
जी हाँ एंकर...
जिनके मुर्ग़े होते हैं
वे ही होते हैं वहाँ के एंकर
ऐसे ही टीवी चैनल बुलाते है
टीकाधारी पंडितों को
दाढ़ी वाले मौलानाओं को
परस्पर विरोधी विचार के धर्मज्ञों को
काँव काँव करते राजनीतिक कौओं को
और फिर शुरु हो जाती है
मुर्ग़ों की लड़ाई
टीआरपी बढ़ रही है
देश गिर रहा है
उनसे क्या
बचो, इनसे भी बचो!

और बन्द कर दो तुम भी अब
सोसल मीडिया पर
आग-आग का खेल
आग किसी एक की नहीं होती
सबकी होती है
फिर भी आग आग है
आग किसी की सगी भी नहीं होती
तुम्हारी भी नहीं
कर देगी खाक किसी दिन
तुम्हें भी
हमें भी और...
सारे वतन को
बचो, बचो इस आग़ से
बचो धर्म और मज़हब के राग से।

नहीं, शायद मैं ग़लत हूँ
बचना हल नहीं है मुश्किल का
बुझाना होगा इसे
हम सबने मिलकर
मत सोचो
कि खाली हमसे क्या होगा
बस इतना सोचो
हमें करना है अपने हिस्से का
गिलहरी योगदान
यकीन जानो
बुझेगी यह आग भी एक दिन
यकीन जानो।

                 ......सुधीर चन्द्र जोशी 'पथिक'

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